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मन में आते अनवरत विचारों के प्रवाह जब शब्दों का रूप लेते है तो कलम चलती है (वर्तमान में कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उँगलियाँ) बस इसी विचार प्रवाह का नाम है "अपनी बात"

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रिश्तों के आइने

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कभी जाने या अनजाने में,
कोई बात कह जाते।
रिश्तों के आइने हैं,
ये पल भर में दरक जाते।।

कोई समझे या ना समझे,
कोई माने य ना माने।
यही रिश्तों की फितरत है,
कि पल भर में बदल जाते।।
कुछ भी कैसे कहूं,
अब तो चुप ही रहूं।
बदलते वक्त के रिश्ते,
किसी की भी न सुन पाते।।
कि कोई रूठ जाता है,
तो कोई छूट जाता है।
समझ में कुछ नहीं आता,
कि जब रिश्ते बदल जाते।।
विरासत मंे हो पाये,
या हो खुद ही बनाये।
महल हैं ऐसे रिश्तों के,
जो ना गिर के संभल पाते।।
अगर रिश्ते निभा पाओ,
पास जा पास ला पाओ।
तो खुशबू रिश्तों में इतनी,
कि घर आंगन महक जाते।।

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रवीण दीक्षित के द्वारा
December 21, 2012

आपके ब्लॉग बहुत सुन्दर और व्यवहारिक से हैं. आपका अतिशय धन्यवाद http://www.praveendixit.jagranjunction.com

    Ashish Mishra के द्वारा
    December 23, 2012

    blog पर आने और प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
December 21, 2012

बहुत खूसूरत पंक्तियाँ बधाई वास्तव में अनमोल होते हुए भी कई बार रिश्ते ही समस्या बन जाते हैं.

    Ashish Mishra के द्वारा
    December 23, 2012

    उत्साह वर्धन के लिए हार्दिक आभार

Santlal Karun के द्वारा
December 20, 2012

आदरणीय आशीष मिश्र जी, रिश्तों को व्याख्यायित करती अत्यंत मर्मस्पर्शी कविता, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “अगर रिश्ते निभा पाओ, पास जा पास ला पाओ। तो खुशबू रिश्तों में इतनी, कि घर आंगन महक जाते।।”

    Ashish Mishra के द्वारा
    December 23, 2012

    उत्साह वर्धन के लिए हार्दिक आभार…

yogi sarswat के द्वारा
December 19, 2012

कोई समझे या ना समझे, कोई माने य ना माने। यही रिश्तों की फितरत है, कि पल भर में बदल जाते। बहुत खूब लिखा आपने , शब्द पसंद आये

seemakanwal के द्वारा
December 17, 2012

बहुत सुन्दर रचना .धन्यवाद .


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