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मन में आते अनवरत विचारों के प्रवाह जब शब्दों का रूप लेते है तो कलम चलती है (वर्तमान में कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उँगलियाँ) बस इसी विचार प्रवाह का नाम है "अपनी बात"

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कड़वी सच्चाई

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हम अपने बुजुर्गों के साथ कर रहे हैं वही व्यवहार कल हमारी संताने हमारे साथ भी कर सकतीं हैं।)
समाप्त

आधुनिक सुविधासम्पन्न घर का एक कमरा। सामने एक मेज व मेज के पास दो कुर्सियाँ पड़ी हुईं हैं। एक कुर्सी पर 25-30 वर्ष का एक नौजवान शिक्षक बैठा है। सामने की कुर्सी पर कक्षा 8 की छात्रा पिंकी बैठी है। देखकर ही अहसास हो जाता है कि वह अपने शिक्षक की बातों को तन्मयता से सुन रही है। साथ ही आवश्यक बिंदुओं को नोट भी करती जा रही है। सहसा बगल के कमरे से खाँसी की आवाज आती है जो धीरे-धीरे तेज होती जाती है।

पिंकी की दादी :- ‘पिंकी……………….. बेटा जरा पानी पिला दे’ (खाँसी धीरे-धीरे बंद होती है)

पिंकी :-  (काॅपी के पेज पलटते हुये) “मैं पढ़ रही हूँ, माँ से कह दो”।

पिंकी की दादी :- “बहू…………….. एक गिलास पानी दे देना” (फिर वही भर्रायी हुई सी आवाज और खाँसी)

शिक्षक :- (पिंकी से) “पिंकी क्या तुम्हारी दादी आयी हुईं हैं?”

पिंकी :- (तैश से) “यस सर, आ गईं हैं। दिन भर सबकी नाक में दम किये रहतीं हैं। कभी पानी  दे दो कभी दवा दे दो। खुद तो पड़ी ही रहतीं हैं हम सबको भी चैन नहीं लेने देंतीं। न जाने पापा इन्हें यहाँ क्यों ले आये। दिन भर खाँस-खाँस कर शोर मचातीं रहतीं हैं।

शिक्षक:- “पिंकी वे तुम्हारी दादी हैं, बुजर्गाें से ऐसे नहीं कहते”।(पिंकी ने मुँह बनाया और पुनः काॅपी के पृष्ठ पलटने लगी।)

पर्दा गिरता है।

सूत्रधार :-  मुझे पिंकी को पढ़ाते एक वर्ष हो गया। आधुनिक परिवार, पिंकी के पिता बैंक मैनेजर हैं और माँ आधुनिक गृहिणी। नगर के अच्छे सभ्य लोगों में गिना जाता है यह परिवार। समाज सेवी संस्थाओं को इस परिवार से दान भी खूब मिलता है। समाचार पत्रों में प्रशंषा छपती है। मैं भी सोचता हूँ वाकई शर्मा जी कितने दयालु हैं। मगर जबसे शर्मा जी अपनी माँ को गाँव से लिवाकर लाये हैं घर का माहौल बिगड़ा-बिगड़ा सा रहता है। बाहर सभ्य दिखने वाले लोग, समाज सेवा का ढांेग करने वाले लोग घर के बुजर्गों की सेवा करने की बजाय उन्हें दुत्कारते हैं। बात-बात पर छिड़की देते हैं। ऐसी समाजसेवा से क्या फायदा? मीटिगों समारोहों में समाजसुधार पर लम्बे भाषण देने वाली मिसेज शर्मा अपनी सास को झिड़कियाँ देतीं हैं, उन्हें एक गिलास पानी पिलाना भी उन्हें बोझ लगता है। मानो बृद्ध सास पानी मांगकर कोई गुनाह कर देतीं हों।

एक दिन………………………..

(कमरा का वही है, कुछ परिवर्तन कमरे में दिखाई दे रहा है। पिंकी पूर्ववत स्थान पर अपने शिक्षक से पढ़ रही है। कमरे के कोने में एक चारपाई पड़ी है, चारपाई पर एक वृद्धा लेटी हुई है। एक तरफ ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी एक 35-40 वर्षीय महिला (मिसेज शर्मा) अपने बाल सवाँर रहीं हैं। उनके हाव-भाव बता रहे हैं कि वह कहीं जाने के लिये तैयार हो रहीं हैं। खाँसी की आवाज कभी तेज तो कभी धीरे वातावरण की शांति को रह-रहकर भंग कर देती है। खाँसी की आवाज कुछ रुकती है और एक भर्रायी हुई सी आवाज गूँजती है- “बहू………. बहू…………..”मिसेज शर्मा-ः (आवाज की दिशा में बिना देखे) “क्या है? आपसे जरा देर चुपचाप लेटा नहीं जाता। पिंकी पढ़ने के बाद अपनी दादी को पानी-वानी दे देना। मैं एक समाजसेवी संस्था की मीटिंग में जा रहीं हूँ।  (ड्रेसिंग टेबल के पास ही रखा बैग उठाकर मिसेज शर्मा का प्रस्थान)(शिक्षक की मुखमद्रा देखने से पता चलता है कि वह विचारमग्न है। पिंकी अपनी काॅपी पर कुछ लिख रही है।)

सूत्रधार :- क्या यही हैं आज के समाजसेवी? घर में अपने बुजर्गों की सेवा तो होती नहीं, समाज की सेवा क्या खाक करेंगे। मंच पर जायेंगे एक लम्बा चौड़ा भाषण देंगे, जनता तालियाँ बजायेगी, सम्मानित किया जायेगा और दूसरे दिन अखबारों में फोटो छप जायेगा, बस हो गई समाजसेवा।

(धीरे-धीरे आ रही खाँसी की आवाज पुनः तेज होती है। शिक्षक की तंद्रा टूटती है और अपनी जगह से उठकर वह बृद्धा के  पास जाता है, उसे पानी पिलाता है। पानी पीकर बृद्धा ने ढेरों आर्शीवाद दिये और शिक्षक की ओर एकटक देखने लगी। बूढ़ी आँखें शायद इस अजनबी शख्स को पहचानने की कोशिष कर रही थीं)

पिंकी की दादी :- “बेटा तुम्हें पहचाना नहीं?”

शिक्षक :- “माता जी, मैं पिंकी को ट्यूशन पढ़ाता हूँ”।

पिंकी की दादी :-  अच्छा-अच्छा जुग-जुग जियो बेटा। भगवान तुम्हें लम्बी उमर दे। तुम्हारा नाम क्या है?

शिक्षक :- “अभिषेक”।

पिंकी की दादी :- “तुम्हें परेशानी हुई होगी बेटा, जाओ पढ़ाओ जाकर”।

शिक्षक :-“नहीं-नहीं माताजी , परेशानी कैसी, मुझे तो खुशी हुई”।

(बृद्ध आँखों से दो बूँद आँसू ढुलक आये, जिन्हंें बृद्धा ने अपनी कँपकँपाती अँगुलियों से पोंछ लिया।)

शिक्षक वापस आकर पिंकी को पढ़ाने लगता है।

तभी शर्मा जी (पिंकी के पापा आयु लगभग 45-48 वर्ष) का कमरे में आगमन।

शर्मा जी :- “पिंकी तुम्हारी माँ कहीं गईं हुईं हैं?”

पिंकी :- “जी, किसी मीटिंग में गईं हैं।”

पिंकी की दादी :- “बेटा तुम्हारे पापा आ गये क्या?”

पिंकी :- “हाँ आ गये हैं”।

पिंकी की दादी :- “रानू आज आफिस से जल्दी आ गया तू?”

मिस्टर शर्मा :- “हाँ माँ, आज हड़ताल हो गई”।

पिंकी की दादी :- “क्यों?”

मिस्टर शर्मा :- “तुम भी अम्मा, तुम क्या करोगी ये सब जानकर”।

पिंकी की दादी :- “कुछ नहीं यूँ ही पूछा था। ये दवा बहू रख गई है, जरा देख ले आकर अभी पीनी है क्या?”

मिस्टर शर्मा :- (खीजते हुये) “ओफ, तुम तो जरा देर चैन से बैठने तक नहीं देती। बोर कर देती हो अपनी बातांे से। अभी थोड़ी देर बाद देख लूँगा”। (अपनी टाई की गाँठ ढीली करते हुये शर्मा जी का नेपथ्य में प्रस्थान)

सूत्रधार :- (बचपन में जो मांयें अपने बच्चों को बिना खीजे एक ही बात सौ बार बतातीं हैं। बच्चों की बेबकूफी भरी बातांे को हँसकर सुनती हैं, उनकी जिज्ञासा शांत करतीं हैं। वही बच्चे बड़े होने पर माँ की बातों से बोर होते हैं। उन्हें बीबी की बातें अच्छी लगती हैं। माँ की बातें सुनना उन्हें पसंद नहीं। भूल जाते हैं उन माँ-बाप के सारे अहसानों को जिन्होंने अपने बच्चे की सलामती के लिये न जाने कितने मंदिरों, मस्जिदों, चर्चांे में दुआयें मांगी। न जाने कितने मंदिरों में दिये जलाये अपने घर के आँगन में एक दीप जलाने के लिये। क्या उन्हें मालूम होता है कि एक दिन यही दीप उन्हें जलायेगा। खुद कष्ट सहे पर बच्चों पर दुःख की छाया भी न पड़ने दी बच्चों की राहों में फूल ही बिछाते रहे। वही बच्चे बड़े होकर आज अपने माँ-बाप के लिये जहर उगल रहे हैं। भले ही आज हम हर क्षेत्र में प्रगति कर रहे हों पर नैतिकता के क्षेत्र में तो हमारा पतन ही हो रहा है।)

मिस्टर शर्मा :-”और मास्टर जी क्या हाल हैं?” (शिक्षक के पास आते हुये)

शिक्षक :- “ठीक हूँ, आप सुनाइये”।

मिस्टर शर्मा :- “एकदम बढि़या, मास्टर जी आपने अपने शहर की ‘परिवार’ नाम की संस्था का नाम तो सुना ही होगा”।

शिक्षक :- “हाँ-हाँ सुना है, बहुत प्रतिष्ठित संस्था है। कोई खास बात?”

मिस्टर शर्मा :- (गर्व से मुस्कराते हुये) “हाँ, आज मुझे उस संस्था का अध्यक्ष चुना गया है।”

शिक्षक :- (उल्लास से हाथ मिलाते हुये) “बधाई हो”।

मिस्टर शर्मा :- “धन्यवाद, कल मदन गेस्ट हाउस में मेरा अभिनंदन समारोह है”। (हाथ में पकड़ा कार्ड शिक्षक की ओर बढ़ाते हुये) “आप विशेष रूप से आमंत्रित हैं।”

(शिक्षक को कार्ड देकर मिस्टर शर्मा का प्रस्थान, शिक्षक पिंकी को पढ़ा रहा है)

पर्दा गिरता है।

दृष्य परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। मंच को फूलों से सजाया गया है। सामने मिस्टर शर्मा के अभिनंदन में एक बैनर भी लगा है। जो समारोह के उद्देश्य को रेखांकित कर रहा है। एक ओर माँ सरस्वती की प्रतिमा व दीपक रखा है। माँ सरस्वती की प्रतिमा के पास ही फूल मालायें भी रखीं हैं। मंच पर मिस्टर शर्मा पधारते हैं। लोग उन्हें फूल-मालाओं से लाद देते हैं, सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता है। मि0 शर्मा मंच पर संस्था के अन्य पदाधिकारियों के साथ अपना स्थान गृहण करते हैं। मंच संचालक माइक पर आते हैं- :

“ सभागार में उपस्थित भाइयों, बहनो, माताओं, प्रिय बच्चो, पत्रकार बंधुओ एवं मंच पर उपस्थित अतिथियो मैं आप सभी का अपनी संस्था ‘परिवार’ की ओर से इस सभागार में हार्दिक स्वागत, अभिनदंन एवं वंदन करता हूँ। मित्रों जैसा कि आप जानते हैं अपने शहर के सम्मानित नागरिक श्री रमेश जी एक प्रमुख समाजसेवी हैं। अनेकों सांस्कृतिक सामाजिक संस्थाओं में आप खुले हाथ से दान देते हैं। अभी पिछले माह ही आपने बेसहारा वृद्धों की साहायता के लिये बन रहे बृद्धाश्रम हेतु 2 लाख रुपये का दान दिया है। आपकी इन समाजसेवी गतिविधियों को देखते हुये हमारी संस्था ‘परिवार’ ने आपको अपना अध्यक्ष चुना है। हमें विश्वास है कि आपके कुशल नेतृत्व में हमारी संस्था निरंतर प्रगति करेगी और समाज के कल्याण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी। और अब मैं अपनी संस्था के नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री रमेश शर्मा जी से निवेदन करता हूँ कि दीप प्रज्जवलन कर कार्यक्रम की शुरुआत करें।”

(रमेश शर्मा ने दीप प्रज्जवलन किया, सरस्वती प्रतिमा पर पुष्पार्चन किया और एक बार पुनः सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।)

मंच संचालक :- अब मैं श्री शर्मा जी से निवेदन करुँगा कि वे माइक पर आयें और हमें अपने ओजस्वी विचारों से अनुग्रहीत करें।

(टाई की नाॅट ठीक करते हुये मि0 शर्मा माइक के सामने आते हैं। एक नजर सभागार में उपस्थित लोगों पर डालते हैं और अपना भाषण प्रारम्भ करते हैं।)

“सभागार में उपस्थित देवियो, सज्जनो,प्यारे बच्चो एवं पत्रकार बंधुओं। सबसे पहले तो मैं धन्यवाद देना चाहूँगा परिवार के सभी सम्मानित सदस्यों पदाधिकारियों को जिन्होंने मुझे ऐसी प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था के अध्यक्ष पद का दायित्व सौंपा, वास्तव में मैं आज स्वयं को गौरावान्वित महसूस कर रहा हूँ। जैसा कि आप जानते ही हैं कि यह संस्था शहर में अपने सामाजिक कार्यों के द्वारा अपनी अलग ही पहचान बनाये हुये है। वैसे तो इस संस्था के द्वारा विभन्न गतिविधियों को संचालित किया जाता है, लेकिन विशेष रूप से बुजुर्गों वृद्धों की सेवा का कार्य इस संस्था के द्वारा किया जाता है।

अभी हाल ही में संस्था की ओर से एक ओल्ड ऐज होम का निर्माण प्रारम्भ कराया गया है। जहाँ बेसहारा, अकेलेपन के शिकार वृद्ध रह सकेंगे। मित्रों लेकिन हमें कोशिष तो यह करनी हैं कि हमारे परिवार के बुजर्ग अकेलापन महसूस न करें। हमें उनकी सेवा करनी चाहिये, उनका पूरा खयाल रखना चाहिये तभी हमारा जीवन सच्चे अर्थों में सफल हो सकेगा।

आज मैं आप सभी से यह वादा करता हूँ कि इस संस्था ने जो पदभार मुझे दिया है मैं उसे पूर्ण निष्ठा से निभाऊँगा और निरंतर इस संस्था को प्रगति की ओर ले जाने का प्रयास करूँगा।

जय हिन्द, जय भारत

(शर्मा जी का भाषण समाप्त होते ही सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता है)

पर्दा गिरता है।

सूत्रधार :- “काश शर्मा जी अपने जीवन के बारे में भी सोचते! समाज कल्याण पर लम्बे भाषण देने वाले मि0 शर्मा जिन्हें लोग समाजसेवी कहते हैं, वह समाजसेवी जिसकी माँ एक गिलास पानी के लिये 10 बार झिड़कियाँ सुनती है। वह समाज सेवी जिसकी माँ भिखारी की तरह, अनाथ की तरह घर के एक कोने में पड़ी रहती है। वह समाजसेवी जो माँ की बांतें सुनकर बोर हो जाता है।”

“शर्मा जी की माँ को गाँव से आये एक माह हो गया था। उनके स्वास्थ्य में भी कुछ सुधार आ गया था। अब वे थोड़ा बहुत चलने फिरने भी लगीं थीं। घर के छोटे-छोटे कार्य भी वे करने लगीं थीं। एक दिन जब मैं पिंकी को पढ़ाने गया तो मिसेज शर्मा ने बताया कि सप्ताह बाद उनकी बड़ी बेटी की शादी है। अतः पिंकी इस सप्ताह नहीं पढ़ सकेगी। साथ ही मिसेज शर्मा ने एक निमंत्रण कार्ड मुझे भी पकड़ दिया, इस निवेदन के साथ कि मैं शादी में अवश्य आऊँ। ”

पर्दा उठता है।

(मंच पर शादी का दृष्य है। लाइटों से मंच जगमगा रहा है। फूलों से सजावट की गई है। नगर के लगभग सभी संभ्रांत नागरिक, अधिकारी समारोह में उपस्थित हैं। शिक्षक के हाव भाव से लग रहा है कि उसकी नजरें समारोह में किसी को खोजने का प्रयास कर रहीं हैं, शायद शर्मा जी की माँ को। लेकिन वह नजर नहीं आतीं। शिक्षक अपना व्यवहार लिखवाता है, तभी उसे मि0 शर्मा और मिसेज शर्मा एक तरफ खड़े दिखाई देते हैं। जिज्ञासावश वह उनके पास जाता है।)

शिक्षक :- “नमस्कार”।

मि0 शर्मा :- “नमस्कार सर, कैसे हैं?”

शिक्षक :-“अच्छा हूँ, आप सुनाइये”।

मि0 शर्मा :- “एकदम बढि़या, सर व्यवस्था में कोई कमी हो बताइये?”

शिक्षक :-  “अरे नहीं, बहुत अच्छा इंतजाम किया है आपने। शर्मा जी आज माताजी दिखाई नहीं दे रहीं?”

मि0 शर्मा :- “मैने उन्हें गाँव भेज दिया है, कुछ दिन बाद बुला लाऊँगा।”

शिक्षक :- “गाँव भेज दिया? शादी के अवसर पर? कोई आवश्यक कार्य था वहाँ?

(मि0 शर्मा कुछ कहें इससे पहले ही मिसेज शर्मा बोल उठीं) “नहीं-नहीं, दरअसल वे गाँव में रहतीं हैं, साफ-सफाई रखतीं नहीं। कितनी भी धुली साड़ी दो कुछ ही देर में गंदी कर लेतीं हैं। अब शादी में हमारे यहाँ आप देख ही रहे हैं शहर के काफी प्रतिष्ठित लोगा आये हुये हैं, अब इन सब के सामने हमें माँ पर शर्मिंदगी महसूस होती। इसीलिये उन्हें गाँव भेज दिया। बस कुछ दिन बाद ही वापस बुला लेंगे।”

(मिसेज शर्मा की बात सुन शिक्षक स्तब्ध रह जाता है। तभी मि0 शर्मा व मिसेज शर्मा किसी अतिथि का स्वागत करने के लिये एक ओर चले जाते हैं। शिक्षक समारोह की चकाचैंध के देखता हुआ वापस लौटता है। उसकी मुखमद्रा से लगता है कि वह गहन चिंतन कर रहा है।)

सूत्रधार :-  “क्या आज के कम्प्यूटर युग में हम इतने अधिक आगे बढ़ गये हैं जो शादी जैसे अवसरों पर भी अपने बुजुर्गों की आवश्यकता महसूस नहीं करते? उनके आर्शीवाद की की जरूरत महसूस नहीं करते? जिस माँ ने जन्म दिया, उँगली पकड़ कर चलना सिखाया आज उसी संतान को अपनी माँ पर अपने परिचितों के सामने शर्म आती है। हम जिंदगी की असलियत क्यों भूल जाते हैं? क्यों भूल जाते हैं हम इस कड़वी सच्चाई को कि एक दिन हमें भी इस वृद्धावस्था के दौर गुजरना है यदि आज हमें अपनी माँ पर अपने बाप पर शर्म आती है तो क्या हमारी संतानों को हमारे ऊपर शर्म नहीं आयेगी? शायद वे भी अपने मित्रों के सामने हमारा रहना पसंद नहीं करेगें। क्यों कि तब हम आज जैसे नहीं होगे।”

(शिक्षक समारोह से बाहर जाता है, धीरे-धीरे पर्दा गिरता है।)

सूत्रधार :-  “खैर शर्मा जी अपनी बेटी की शादी के पंद्रह दिनों बाद अपनी माँ को वापस ले आये। गाँव में अकेले एक नौकरानी के सहारे से क्या होता। नतीजा उनकी तबियत पुनः खराब हो गई। यहाँ आने के के बाद फिर से उनका इलाज शुरू कराया गया मगर जितना फायदा दवाओं से होता उससे अधिक नुकसान बेटे-बहू की तीर सी चुभती बातों से होता। धीरे-धीरे उनकी तबियत बिगड़ती गई और एक दिन……….

(पर्दा धीरे-धीरे उठता है)

(शर्मा जी के घर में कोहराम सा मचा है। तमाम परिजन एकत्रित हैं। मि0 शर्मा व मिसेज शर्मा भी रो रहें हैं। रोते हुये ही मि0 एण्ड मिसेज शर्मा अपनी माँ के बारे में लोगों को बता रहे हैं कि कितनी अच्छी थीं उनकी माँ, आज मिसेज शर्मा कह रहीं थी कि उनकी सास ने हमेशा उन्हें बहू नहीं बेटी समझा। उनके चले जाने से अब घर सूना सा हो गया। लोग मि0 एण्ड मिसेज शर्मा को सांत्वना दे रहे थे।)

(मित्रों, ये सिर्फ कहानी नहीं बल्कि आज के आधुनिक और सभ्य कहे जाने वाले समाज की कड़वी सच्चाई है। वृद्धावस्था से हर इंसान को गुजरना है फिर भी हम इस कड़वी सच्चाई को नजरंदाज कर देते हैं। समााज की नजरों में भले ही हम विद्वान, डाॅक्टर, इंजीनियर, आई0ए0एस0 बन जायें पर नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों की दुनियाँ में हमें डी0 ग्रेड से भी नीचे का व्यक्तित्व प्राप्त होगा। हमें याद रखना चाहिये कि जो व्यवहार आज हम अपने बुजुर्गों के साथ कर रहे हैं वही व्यवहार कल हमारी संताने हमारे साथ भी कर सकतीं हैं।)

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 26, 2012

अच्छी रचना

Sushma Gupta के द्वारा
November 25, 2012

प्रिय आशीष जी, आज के परिप्रेक्ष में आपने सम्मानित बुजुर्गों के प्रति आज की पीड़ी की उदासीनता का अत्यधिक मार्मिक एवं सच्चा चित्रण उपस्थित किया है,आज हम सभी को इस ओर सोचने की गंभीर आवश्यकता है | साभार……

    Ashish Mishra के द्वारा
    November 25, 2012

    आदरणीया सुषमा जी, ब्लॉग पर आने और प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद.

Ashish Mishra के द्वारा
November 25, 2012

..

    Ashish Mishra के द्वारा
    November 25, 2012

    ब्लॉग पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यबाद शालिनी जी.


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