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मन में आते अनवरत विचारों के प्रवाह जब शब्दों का रूप लेते है तो कलम चलती है (वर्तमान में कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उँगलियाँ) बस इसी विचार प्रवाह का नाम है "अपनी बात"

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कवि महोदय

Posted On 16 Nov, 2012 Others, लोकल टिकेट में

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हमारे शहर में एक कवि महोदय है, वैसे एक नहीं अनेक हैं। लेकिन वह अपने आप में कुछ खास ही हैं, जिनकी महिमा का गुणगान मैं यहाँ करने जा रहा हूँ। जिसे भी उनसे एक बार मिलने का सुअवसर मिलता है धन्य-धन्य हो जाता है, क्यों कि धन्य होने के सिवाय उसके पास कोई चारा ही नहीं रहता। लोग उनसे बचकर निकलते हैं, कभी-कभी कोई फंसता है, फिर भला उसे बिना कविता सुनायें कैसे जाने दें। चाहे आपसे उनकी भेंट बीच सड़क पर ही क्यों न हो, कवि हैं तो कविता तो सुनायेंगे ही।

वैसे मुझे शेर से नहीं, शियार से नहीं, गोली से नहीं, बारूद से नहीं मतलब दुनियाँ में डरने वाली किसी भी वस्तु या प्राणी से यानि कि चूहे और काक्रोच तक से डर नहीं लगता। लेकिन कवि नाम के जन्तु से मैं बेहद घबराता हूँ। परन्तु दुःख इस बात का है कि अक्सर इस खतरनाक जन्तु से टकराता हूँ। अभी उस दुर्घटना को भूला ही कहाँ हूँ, ख्यालों के घोड़े पर सवार मैं कहीं जा रहा था। सहसा किसी ने घोड़े को लगाम लगाई। सामने देखा तो दुनियाँ की सर्वाधिक खतरनाक प्रजाति कवि की सूरत नजर आयी। मन किया सरपट भागूँ, मगर भागता कैसे ? उस विशालकाय आकृति ने मेरा बाजू बड़े प्यार से पकड़ रखा था। खैर! कोई बात नहीं, उन्होंने मेरा हाल पूछा अब हाल क्या बताता? हाल तो उन्हें देखते ही बेहाल हो चुका था। लेकिन उन्होंने मेरे चेहरे पर उभर आयी जबरदस्ती की मुस्कराहट को देखकर स्वयं ही अंदाजा लगा लिया कि मेरा हाल अच्छा ही है। लगे हाथ बिना पूछे ही उन्होंने अपना हाल भी बता डाला।
हाल बताते-बताते उन्हें याद आ गई अपनी एक कविता की पंक्तियां और फिर कवितागान का अनवरत सिलसिला शुरू हो गया। कुछ ही देर में वहाँ बच्चों व राह चलते लोगों की भीड़ जमा हो गयी। मै नहीं बता सकता कि वह ध्यानमग्न होकर उनकी कविता सुन रहे थे या फिर मेरी दयनीय दशा पर हँस रहे थे। कुछ राह चलते लोग हमारी ओर देखते और मुस्कराकर निकल जाते। कविता पाठ करते-करते वह बड़े ही मस्त हो गये और मेरा बाजू छोड़ दिया। मैं पिंजरे से छूटे पंछी की भाँति उड़ निकला। दूसरे दिन कुछ जानने वालों के माध्यम से पता चला कि मेरे वहाँ से भागने के दो घंटे बाद तक वह अनवरत कविता पाठ करते रहे। जब ब्रेक लिया और मुझे वहाँ नहीं पाया तो बाकी की कवितायें किसी और निरीह प्राणी की तबियत दुरूस्त करने के लिये सुरक्षित कर वहाँ से चल दिये।
पिछले वर्ष सुनने को मिला कि उन्हें एक सर्प ने डस लिया है, जहर निष्क्रिय करने का इंजेक्शन तो डाॅक्टर ने लगा दिया था। मगर उसने यह भी ताकीद की थी कि मरीज को रात में सोने न दिया जाये अन्यथा खतरा हो सकता है। कवि महोदय को जगाने का इंतजाम किया ‘‘ढाक’’ (थाली, ढोलक, मंजीरा आदि बजाकर सांप का जहर उतारने की विशेष कला) बजाने वालों ने।
उन्होंने ढाक बजानी शुरू कर दी, अचानक कवि महोदय को ढाक के देशी संगीत की धुन अपनी एक कविता से मेल खाती लगी। उन्होने ने अपनी कविता ढाक के संगीत के साथ गानी प्रारम्भ कर दी। सुबह जब इस शहर के लोगों के साथ-साथ मुझे भी इस घटना बारे में पता चला तो बड़ी सावधानी पूर्वक वहाँ पहुँचा। मगर नजारा अजीब था! कवि महोदय तेज स्वर में कविता पाठ कर रहे थे और ढाक बजाने वाले छहों व्यक्ति वहीं लुढ़के पड़े थे।
कवि महोदय की शादी का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। न जाने कितनी कोशिषें की मगर कोई लड़की कवि लड़के से शादी करने को हर्गिज तैयार न थी। जैसे-तैसे उनके माता-पिता ने उनकी शादी दूर के एक शहर से तय कर दी। शायद लड़की को पता नहीं चल पाया था कि लड़का कवि है। शादी हो गई, दुल्हन घर आ गई। कवि महोदय ने कमरे में सजी-संवरी बैठी दुल्हन का घूँघट उठाया, बरबस ही उस स्वप्न सुन्दरी की प्रशंषा में दो पंक्तियां निकल गईं।
‘‘बहुत प्यारी कविता है यह’’, लजाती, शरमाती दुल्हन ने पंक्तियों की प्रशंषा कर दी। उस बेचारी को क्या मालूम था कि ऐसा करके वह कविता रूपी बारूद के ढेर में आग लगा रही है। अपनी कविता की प्रशंषा सुन कवि महोदय अभिभूत हो गये और लगे धड़ा-धड़ एक के बाद एक कवितायें सुनाने। अब यह तो पता नहीं कि उनकी महबूबा ने कितनी देर तक इस सुनामी को सहन किया। मगर यह मालूम है कि दूसरे दिन उनके घर वालों ने उन्हें संजे-संवरे पलंग पर अकेले बैठ कविता पाठ करते पाया, कमरे का दरवाजा खुला पड़ा था, उनकी महबूबा नदारद थी।
इस घटना से बेचारे कवि महोदय बेहद दुःखी हुये। लेकिन शहर के कुछ बुद्धिजीवियों ने उन्हें समझाया कि अब तो आप की कवितायें और भी बेहतर होंगी, क्यों कि जब तक जिंदगी में दर्द न हो तब तक आवाज और रचना में मजा नहीं आता।
खैर कुछ भी हो लेकिन यह सच है कि राष्ट्र की इन कवि रूपी महाशक्तियों का सदुपयोग किया जा सकता है। मैं आज ही भारत सरकार को पत्र लिखकर सुझाव दूँगा कि पाकिस्तानी आतंकवादियों से निपटने का बड़ा ही आसान सा उपाय है कि देश के सारे कवियों को सीमा पर भेज दिया जाये। फिर देखें कैसे निपटते हैं आतंकवादी इन महाशक्तियों से।
वैसे अगर आपका भी कभी इस कवि रूपी से प्राणी से सामना हुया हो तो टिप्पणी करके बतायें।

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
November 20, 2012

आपने हास्य लिखने की कोशिश करी है लेकिन सही कहूं तो आपका विषय पसंद नहीं आया होगा बहुत से लोगों को ! क्योंकि इस मंच पर बहुत से लोग कवी हैं और मुझे लगता है की कवी होना कोई दुर्भाग्य या हंसी का पात्र बन जाना नहीं है ! कवी की कविता दिल से निकलती है , वो अपनी पीड़ा भूल कर दूसरों की पीड़ा को देखता है और उसे अपने शब्दों में बयान करता है ! कवी ही वो व्यक्ति भी है जिसकी रचनायें सुनकर और गा गाकर बड़े बड़े आन्दोलन किये जाते रहे हैं ! एक सच्चा कवी समाज और देश को नयी दिशा देने की काबिलियत भी रखता है ! कौन भूल सकता है की दुष्यंत भी एक कवी ही थे , कौन भूल सकता है की नजरुल इस्लाम भी एक कवी ही थे ?

    Ashish Mishra के द्वारा
    November 20, 2012

    प्रिय योगी जी, ब्लॉग को विजिट कर अपना अमूल्य समय देने के लिए धन्यवाद. आपको उत्तर देने से पहले मैं बता दूँ की मैं स्वयं एक कवि हूँ, और मुझे नहीं पता कि कविता लिखने का यह हुनर या बीमारी मुझे कैसे लगी. ? पर यह पता है मैं जब कक्षा ८ का विद्यार्थी था तब से ही कवितायेँ लिख रहा हूँ. उस समय कवि सम्मलेन में भी खूब सहभागिता की परिणाम स्वरूप जब तब माँ-पापा और शिक्षकों का कोप भाजन भी बनना पड़ा. दूरदर्शन, आकशवाणी आदि पर भी जाने का अवसर मिला साथ ही फ़िल्मी दुनिया के लिए भी कुछ रचनाएँ स्वीकृत हुई. अब एक बात बताइए की हम लोग यानि “कवि” -: प्रधानमंत्री के ऊपर हास्य लिखते हैं. मुख्यमंत्री के ऊपर हास्य लिखते हैं. सरकारी शिक्षको के ऊपर हास्य लिखते हैं. पति-पत्नी पर हास्य लिखते हैं. कुल मिलकर लगभग हर पद और रिश्तो पर हास्य लिखते हैं. क्या प्रधानमंत्री बनना हंसी या दुर्भाग्य का पात्र बन जाना है? क्या मुख्यमंत्री बनना हंसी या दुर्भाग्य का पात्र बन जाना है? क्या पति या पत्नी बनना हंसी या दुर्भाग्य का पात्र बन जाना है? अगर हम यह सोचें की कवि पर हास्य लिख लिख कर कवि मुझसे नाराज हो जायेंगे तो ऐसा नहीं है. क्योंकि यह हास्य जागरण ब्लॉग पर अभी डाला है इससे पहले यह कई ऐसी पत्रिकओं में छपा है जिनके संपादक कवि हैं. उन्होंने न सिर्फ इस हास्य को पसंद किया बल्कि पुरष्कृत भी किया. निश्चिंत रहें, एक सच्चा कवि संकुचित ह्रदय हो ही नहीं सकता. मस्त रहो- व्यस्त रहो. आपका अपना आशीष मिश्र

Tufail A. Siddequi के द्वारा
November 19, 2012

आदरणीय आशीष जी सादर अभिवादन, स्वागत. रोचक पोस्ट. बहुत-२ बधाई.. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

    Ashish Mishra के द्वारा
    November 19, 2012

    ब्लॉग पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
November 19, 2012

प्रथम पोस्ट पर बधाई और स्वागत.रोचक प्रस्तुति

    Ashish Mishra के द्वारा
    November 20, 2012

    ब्लॉग पढ़ने प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 18, 2012

बहुत अच्छा

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
November 16, 2012

आशीषजी… रोचक प्रस्तुति…..

    Ashish Mishra के द्वारा
    November 17, 2012

    धन्यवाद

Ashish Mishra के द्वारा
November 16, 2012

..


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